भारत अपनी पांडुलिपि धरोहर का मानचित्रण प्रारंभ करेगा

पाठ्यक्रम: GS1/ संस्कृति

संदर्भ

  • संस्कृति मंत्रालय ने भारत की विशाल पांडुलिपि धरोहर का मानचित्रण करने हेतु प्रथम बार तीन माह का राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण प्रारंभ किया है।
    • यह पहल ज्ञान भारतम् मिशन का हिस्सा है, जिसकी घोषणा केंद्रीय बजट 2025–26 में की गई थी।

ज्ञान भारतम् मिशन

  • ज्ञान भारतम् मिशन: यह एक राष्ट्रीय मिशन है जिसका उद्देश्य भारत की पांडुलिपि धरोहर और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का सर्वेक्षण, प्रलेखन, डिजिटलीकरण तथा प्रसार करना है। इसके अंतर्गत एक राष्ट्रीय डिजिटल भंडार की स्थापना भी की जाएगी।
  • इस पहल को समर्थन देने हेतु स्थायी वित्त समिति (SFC) ने वर्ष 2025 से 2031 की अवधि के लिए ₹491.66 करोड़ की स्वीकृति प्रदान की है।

पहल का महत्व

  • धरोहर संरक्षण: डिजिटलीकरण और प्रलेखन से संवेदनशील पांडुलिपियों को क्षरण और नष्ट होने से बचाया जा सकेगा।
  • अनुसंधान सुलभता: केंद्रीकृत भंडार से विद्वानों और आमजन के लिए पहुँच आसान होगी।
  • बौद्धिक चोरी पर रोक: उचित अभिलेख और मेटाडाटा से प्रामाणिकता स्थापित होगी तथा दुरुपयोग रोका जा सकेगा।
  • सांस्कृतिक पुनरुत्थान: अधिक दृश्यता से भारत की साहित्यिक और ज्ञान परंपराओं को बढ़ावा मिलेगा।

पांडुलिपियाँ क्या हैं?

  • पांडुलिपि वह हस्तलिखित रचना है जो ताड़पत्र, भोजपत्र, वस्त्र, कागज़ अथवा धातु जैसी सामग्रियों पर लिखी जाती है, और जिसकी आयु कम-से-कम पचहत्तर वर्ष हो। इसमें ऐतिहासिक, वैज्ञानिक अथवा सौंदर्यात्मक महत्व निहित होता है।
  • यह भारत की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान प्रणालियों का प्रतिनिधित्व करती है।
  • भारत में सबसे प्राचीन जीवित पांडुलिपि संग्रह गिलगिट पांडुलिपियाँ हैं, जो 5वीं–6वीं शताब्दी ईस्वी की हैं। ये गुप्त ब्राह्मी और उत्तर-गुप्त ब्राह्मी लिपि में बौद्ध मिश्रित संस्कृत भाषा में लिखी गई हैं।
  • इनमें बौद्ध ग्रंथ सम्मिलित हैं जो संस्कृत, चीनी, कोरियाई, जापानी, मंगोलियाई, मंचू और तिब्बती धर्म-दर्शन साहित्य के विकास पर प्रकाश डालते हैं।

पांडुलिपि धरोहर संरक्षण हेतु अन्य उपाय

  • राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (2003): इसने अपनी महत्वाकांक्षी डिजिटल भंडार कृति संपदा के माध्यम से 44.07 लाख से अधिक पांडुलिपियों का प्रलेखन किया है।
  • अभिलेख पटल: राष्ट्रीय अभिलेखागार की पहल, जिसके अंतर्गत एक मिलियन से अधिक अभिलेखों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया गया है, जिनमें पांडुलिपियाँ, प्राच्य अभिलेख और निजी पत्र शामिल हैं।
  • ज्ञान-सेतु: यह एक राष्ट्रीय चुनौती है, जिसका उद्देश्य एआई-आधारित समाधान विकसित करना है ताकि पांडुलिपियों का संरक्षण, व्याख्या, पुनर्स्थापन और पहुँच सुनिश्चित हो सके।
  • प्राचीन वस्तुएँ एवं कला निधि अधिनियम, 1972: इसका उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक धरोहर, विशेषकर मूल्यवान पांडुलिपियों के अवैध निर्यात और तस्करी को रोकना है।
    • पांडुलिपियाँ और अभिलेख यदि कम-से-कम 75 वर्ष पुराने हों तो वे प्राचीन वस्तुओं की श्रेणी में आते हैं।
  • यूनेस्को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ कार्यक्रम: यह दुर्लभ पांडुलिपियों सहित दस्तावेजी धरोहर के संरक्षण को मान्यता और प्रोत्साहन देता है।

राष्ट्रीय अभिलेखागार

  • राष्ट्रीय अभिलेखागार की स्थापना 1891 में कोलकाता (कलकत्ता) में इम्पीरियल रिकॉर्ड विभाग के रूप में हुई थी।
  • 1911 में राजधानी के कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण के पश्चात 1926 में इसका भवन सर एडविन लुटियन्स द्वारा निर्मित किया गया।
    • 1937 में सभी अभिलेखों का स्थानांतरण नई दिल्ली में पूर्ण हुआ।
  • यह अभिलेखागार सार्वजनिक अभिलेख अधिनियम, 1993 और सार्वजनिक अभिलेख नियम, 1997 के क्रियान्वयन की प्रमुख एजेंसी भी है।

Source: TOI

 

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